समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा के समावेशन पर दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल में समाजशास्त्र विषय के तृतीय एवं चतुर्थ सेमेस्टर के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) के समावेशन के उद्देश्य से दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ 24 अगस्त को हुआ। कार्यशाला का आयोजन 24 एवं 25 अगस्त 2026 को शिप्रा हॉल, कुलगुरु कार्यालय में किया जा रहा है।
कार्यशाला का उद्देश्य समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय सामाजिक चिंतन, सांस्कृतिक मूल्यों तथा भारतीय समाज की ज्ञान-परंपराओं को समकालीन संदर्भों के साथ सार्थक रूप से शामिल करने की दिशा में विचार-विमर्श करना है।
इस कार्यशाला के माध्यम से यह प्रयास किया जाएगा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल परंपरागत ज्ञान के रूप में न देखते हुए उसके विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयामों को वर्तमान समाजशास्त्रीय अध्ययन और उच्च शिक्षा के संदर्भ में समझा जाए।
कार्यशाला के प्रथम दिवस का शुभारंभ प्रातः 10:30 बजे दीप प्रज्वलन एवं उद्घाटन समारोह से हुआ। इसके पश्चात अतिथियों का पुष्पगुच्छ, श्रीफल एवं श्रीवस्त्रम देकर स्वागत किया गया, प्रो दिनेश दवे जी ने कार्यशाला का परिचय रखा तत्पश्चात मुख्य अतिथि का उद्बोधन होगा। कार्यशाला में प्रो. आर. सी. भारद्वाज, प्रो. मनोज सिंह, प्रो. दीवाकर राजपूत एवं प्रो. विवेक शर्मा, प्रो एस बी सिंह सहित विषय विशेषज्ञों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
कार्यशाला के प्रथम दिवस में प्रो. आर. सी. भारद्वाज द्वारा विशेष व्याख्यान दिया गया, उन्होंने बताया कि पिछले 150 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था पर यूरोसेंट्रिक दृष्टिकोण का प्रभाव रहा है, जिसके कारण भारतीय समाज की संरचना को प्रायः नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में भारतीय समाज की सकारात्मक विशेषताओं, सामाजिक समरसता और समाज को जोड़ने वाले मूल्यों को समुचित स्थान मिलना चाहिए। भारतीय परंपरा में व्यक्ति का मूल्यांकन केवल जन्म से नहीं, बल्कि गुण, कर्म और योग्यता के आधार पर किया गया है। उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच सत्यता को समझते हुए बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन स्वीकार करने तथा पश्चिम और भारतीय परिपेक्ष के अंतर को ध्यान में रखते हुए परिवार, समुदाय और सामाजिक समरसता को भारतीय समाज के अध्ययन में विशेष महत्व देने पर बल दिया।
इसके पश्चात प्रो. दिवाकर राजपूत जी ने बताया कि भारतीय समाजशास्त्र के अध्ययन में भारतीय विचार एवं सिद्धांतों को समुचित रूप से शामिल करते हुए, विषय-वस्तु को भारतीय सामाजिक संदर्भों से जोड़ने पर बल दिया गया। नवीन शोध एवं पुनरीक्षण के माध्यम से पाठ्यक्रम में स्थानीय ज्ञान, स्वदेशी ज्ञान-परंपरा (Indigenous Wisdom) तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) को उचित स्थान देने की आवश्यकता व्यक्त की गई। साथ ही, प्रत्येक सामाजिक समस्या एवं अवधारणा को केवल पश्चिमी दृष्टिकोण से न देखकर भारतीय मौलिक दृष्टिकोण से समझने तथा भारतीय समाज की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित करने पर जोर दिया गया।
प्रो. माधवीलता दुबे एवं प्रो. दीप्ति श्रीवास्तव की सहभागिता में आगामी अकादमिक कार्यों के लिए एजेंडा निर्धारण पर चर्चा हुई।
दोपहर के सत्र में एम.ए. तृतीय एवं चतुर्थ सेमेस्टर/द्वितीय वर्ष के प्रश्न-पत्रों के शीर्षकों पर चर्चा एवं उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया संपन्न हुई। साथ ही प्रश्न-पत्र समन्वयकों का अंतिम निर्धारण भी किया गया।
आयोजन एवं सहयोग: कार्यशाला का आयोजन समाजशास्त्र विभाग, बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल के सहयोग से किया जा रहा है। कार्यशाला के आयोजन में प्रो. रुचि घोष, प्रो. के. एस. कश्यप एवं प्रो. एस. एस. ठाकुर का महत्वपूर्ण सहयोग एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
कार्यशाला का दूसरा दिवस 25 अगस्त को होगा, जिसमें विभिन्न प्रश्न-पत्रों पर प्रस्तुतीकरण एवं चर्चा, VAC (CHM/EESC) पर प्रस्तुतीकरण, कार्य, गतिविधियों एवं अनुसंधान में भारतीय ज्ञान परंपरा के एकीकरण, संदर्भग्रंथों एवं संदर्भ सामग्री की पहचान तथा समय-सीमा के निर्धारण सहित विभिन्न अकादमिक विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
इस कार्यशाला से समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम को भारतीय सामाजिक चिंतन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के समृद्ध स्रोतों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण अकादमिक पहल को गति मिलने की अपेक्षा है।
बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल में 24–25 अगस्त को आयोजित हो रही है कार्यशाला







