विवेकानंद को जानना ही नहीं, उनके विचारों को जीना भी आवश्यक-अशोक पांडेय
आई.ई.एच.ई. भोपाल में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा स्थापित, युवाओं को मिला राष्ट्र निर्माण और कर्तव्यबोध का संदेश

भोपाल। उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान (आई.ई.एच.ई.), भोपाल में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर उनके जीवन, व्यक्तित्व, विचारों और युवा शक्ति को केंद्र में रखते हुए विशेष कार्यक्रम का आयोजन संस्थान के संचालक डॉ. प्रज्ञेश कुमार अग्रवाल के मार्गदर्शन में किया गया। कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद के विचारों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर चर्चा के साथ विद्यार्थियों को उनके आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विशेष तिवारी एवं दिव्यांशी ने अतिथियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के स्वागत के साथ किया। उन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा एवं उद्देश्य से उपस्थित जनों को अवगत कराया। इसके पश्चात् विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। इस अवसर पर सरस्वती वंदना एवं तबला वादन की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री अशोक पांडेय, प्रांत संघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विशिष्ट अतिथि श्री सोमकांत उमाळकर, विभाग संघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अन्य अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया गया। प्रो. एच.बी. गुप्ता ने अपने संबोधन में स्वामी विवेकानंद के विराट व्यक्तित्व और विशिष्ट चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन युवाओं के लिए आत्मविश्वास, दृढ़ संकल्प और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा है। उन्होंने विद्यार्थियों से स्वामी विवेकानंद के जीवन और आदर्शों से प्रेरणा लेकर अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने भी स्वामी विवेकानंद के जीवन और चिंतन के विविध पक्षों पर अपने विचार रखे। अव्यय त्रिपाठी ने शिकागो धर्म सम्मेलन के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के विचारों और आध्यात्मिकता के महत्त्व को रेखांकित किया। शिवानी मेवाड़ा ने उनके शिक्षा संबंधी विचारों पर प्रकाश डाला। पुण्य तिवारी ने स्वामी विवेकानंद के जीवन और प्रभावशाली व्यक्तित्व का परिचय देते हुए युवा शक्ति के प्रति उनके विश्वास को सामने रखा। आन्या जैन ने युवा शक्ति और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के विचारों की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि श्री अशोक पांडेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचारों को केवल पढ़ना और जानना पर्याप्त नहीं है, अपितु उन्हें अपने आचरण और व्यावहारिक जीवन में उतारना भी आवश्यक है। उन्होंने भारतीय जीवन-दृष्टि में आध्यात्मिकता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय जीवन का मूल आधार आध्यात्मिकता रही है। मानव-मानव के बीच भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए तथा मानवता की भावना ही व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाती है। उन्होंने विद्यार्थियों से संस्कारवान एवं उत्तरदायी नागरिक बनने, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने तथा स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने ‘अन्न ही ब्रह्म है’ के भाव की व्याख्या करते हुए अन्न के प्रति सम्मान एवं संवेदनशीलता रखने का संदेश भी दिया।
संस्थान के संचालक डॉ. प्रज्ञेश कुमार अग्रवाल ने अपने संबोधन में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा स्थापना के महत्त्व और उसके प्रतीकात्मक स्वरूप को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि किसी महान व्यक्तित्व की प्रतिमा केवल एक मूर्ति नहीं होती, अपितु वह उनके विचारों, आदर्शों और जीवन-दृष्टि की निरंतर प्रेरक उपस्थिति का प्रतीक होती है। उन्होंने विद्यार्थियों को जीवन में बड़े सपने देखने, स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की प्रेरणा दी। डॉ. अग्रवाल ने महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला और स्वामी विवेकानंद के बीच हुए वैचारिक संपर्क का उल्लेख करते हुए कहा कि विवेकानंद के चिंतन और भारतीय दर्शन की चर्चा विश्व के बौद्धिक जगत तक पहुँची थी। उन्होंने विद्यार्थियों से स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रज्ञा नायक ने आभार प्रदर्शन किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, संचालक, शिक्षकों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए समाज के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों को रेखांकित किया। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग के लिए डॉ. महेंद्र सिंघई एवं डॉ. सभाकांत द्विवेदी का विशेष रूप से धन्यवाद ज्ञापित किया।
स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम उनके विचारों, आध्यात्मिक चिंतन, शिक्षा-दृष्टि और युवा शक्ति के संदेश को विद्यार्थियों तक पहुँचाने का सार्थक माध्यम बना। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि स्वामी विवेकानंद के प्रति सच्ची श्रद्धा उनके विचारों को केवल स्मरण करने में नहीं, अपितु उन्हें अपने व्यक्तित्व, आचरण और सामाजिक जीवन में आत्मसात करने में निहित है।







