शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण से वेंटिलेटर पर पहुंची शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सर्व समाज और देश के भविष्य का निर्माण करने वाली सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था है। या कहा जाए कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। किन्तु दुर्भाग्य है कि आज देश की शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि मानो देश की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर पहुंच चुकी हो और इसके लिए जिम्मेदार लोग मूकदर्शक और तमाशबीन बने हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते बाजारीकरण, शिक्षा माफियाओं का वर्चस्व, परीक्षाओं में घोटाले, पेपर लीक, फर्जी डिग्रियां और भ्रष्टाचार से युवाओं के सपनों को लगातार  कुचला जा रहा है।
वर्तमान परिवेश में  शिक्षा सेवा का भाव नहीं, बल्कि करोड़ो –अरबों रुपये का कारोबार बनता जा रहा है। स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में शिक्षा के नाम पर भारी-भरकम फीस वसूली जा रही है।

गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए जहां एक और कर्ज लेने को मजबूर हैं, लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद छात्रों को न गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है और न ही रोजगार की गारंटी। वही अमीरचंदों की बिगडैल औलादो को शिक्षा प्राप्त करना और डिग्रियां हासिल करना महज एक खिलौना बन गया है।   इतना ही नहीं कई संस्थानों में गरीब और होनहार विद्यार्थियों को डिग्री के नाम पर केवल कागज का टुकड़ा थमा दिया जाता है, जिसका व्यावहारिक जीवन में कोई महत्व नहीं होता और वे अपने भविष्य की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर रहते हैं।

नर्सिंग घोटाला, फर्जी कॉलेजों की मान्यताएं, निरीक्षण में भ्रष्टाचार, प्रतियोगी परीक्षाएं, नीट परीक्षाएं, पेपर लीक  और शिक्षा संस्थानों की मनमानियों ने पूरे शिक्षा तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। विगत वर्ष हुए नर्सिंग घोटाले में 50 से अधिक अकाल मृत्यु इसका एक जीवंत उदाहरण है। जब वह मंजर याद आता है तो शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होना लाजिमी हो जाता है। पात्र को अपात्र और अपात्र को पात्र बनाने की साजिशें खुलेआम चल रही हैं। योग्यता, मेहनत और प्रतिभा को दरकिनार कर धनबल और प्रभाव के आधार पर युवाओं को अवसर बांटे जा रहे हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक है, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत पर भी सीधा आघात कर रही है।

जहां एक ओर प्रतियोगी परीक्षाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक है, वहीं देश के करोड़ों युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम करके सरकारी नौकरियों और पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए तैयारी तो करते हैं, लेकिन बार-बार होने वाले पेपर लीक और परीक्षा घोटाले उनकी मेहनत को हास्यस्पद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। नीट सहित कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने युवाओं के विश्वास को गहरा आघात पहुंचाया है। प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर बार-बार आवेदन शुल्क वसूलना, परीक्षाएं निरस्त करना, परिणामों में देरी और प्रशासनिक लापरवाही भी प्रतिभागियों के साथ बेमानी और अन्याय का प्रतीक बन चुकी है।

विडंबना यह है कि शिक्षा के लिए आवंटित सरकारी बजट का लाभ छात्रों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता, जबकि दूसरी ओर युवा महंगी फीस, कोचिंग, आवेदन शुल्क और अन्य खर्चों के बोझ तले दबते जा रहे हैं। शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ रहा है और युवाओं की जेब पर अप्रत्यक्ष रूप से डाका डाला जा रहा है। शिक्षा और रोजगार पाने की प्रक्रिया इतनी महंगी होती जा रही है कि आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली युवा अवसरों से वंचित हो रहे हैं।

इस पूरी व्यवस्था का सबसे खतरनाक प्रभाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। वर्षों की मेहनत के बाद जब परीक्षा रद्द हो जाती है, पेपर लीक हो जाता है, परिणाम विवादों में घिर जाते हैं या भ्रष्टाचार के कारण योग्य उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं, तब युवाओं में निराशा, हताशा और अविश्वास पैदा होता है। अनेक युवा अवसाद का शिकार हो जाते हैं और कुछ आत्महत्या जैसा अप्रिय कदम उठाने तक के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता है।

बर्बाद होते युवाओं का भविष्य केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं है। इसका सीधा प्रभाव समाज और राष्ट्र पर पड़ता है। जब योग्य युवाओं को अवसर नहीं मिलते, तब देश को योग्य डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, नर्स और प्रशासक नहीं मिल पाते। बेरोजगारी, सामाजिक असंतोष, अपराध, नशाखोरी और व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता है। एक ऐसा समाज तैयार होता है जिसमें प्रतिभा हतोत्साहित और भ्रष्टाचार पुरस्कृत होता है।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि शिक्षा माफियाओं में कानून का भय लगभग समाप्त होता दिखाई दे रहा है। बार-बार घोटाले उजागर होने के बावजूद दोषियों पर कठोर कार्रवाई का अभाव उनके हौसलों को और बढ़ाता है। शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में व्याप्त यह अराजकता राष्ट्र के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।

आज आवश्यकता केवल सुधारों की नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की है। शिक्षा को व्यापार और मुनाफे की मानसिकता से मुक्त कर राष्ट्र निर्माण का साधन बनाना होगा। परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और सुरक्षित बनाना होगा, शिक्षा माफियाओं पर कठोर कार्रवाई करनी होगी तथा योग्य विद्यार्थियों को न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे।

यदि आज भी सरकारें, नीति निर्माता और जिम्मेदार संस्थाएं नहीं चेतीं, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। क्योंकि जब शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर हो और जिम्मेदार लोग तमाशबीन बने रहें, तब केवल युवाओं का भविष्य नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।

*देश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए छात्रों की गूंज पूरे देश में गूंज रही है* विपिन

Vijay Vishwakarma

Vijay Vishwakarma is a respected journalist based in Bhopal, who reports for Goodluck Media News. He is known for his exceptional reporting skills and extensive knowledge of the region. With a keen eye for detail and a passion for uncovering the truth, he has earned a reputation as a reliable and trustworthy source of news.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button