शासकीय महाविद्यालयों के जनभागीदारी समिति से संविदा फिक्स वेतन के कर्मचारी को महंगा पड़ा माननीय न्यायालय जाना..

माननीय उच्च न्यायालय ने शासकीय महाविद्यालयों के स्थानीय प्रबंधन जनभागीदारी समिति से संविदा, फिक्स वेतन पर रखे गए स्थायी कर्मी कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का दिया आदेश….
माननीय उच्च न्यायालय ने स्थायी कर्मी आदेश निरस्त करने से पूर्व एक कारण बताओ नोटिस जारी करने का दिया आदेश।
उच्च शिक्षा विभाग के किसी व्यक्ति ने सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश के विरुद्ध जोड़ दिया था जनभागीदारी समिति के श्रमिक ?
संविदा कर्मचारी और उच्च योग्यता धारी को चोरी छिपे बताया श्रमिक ?
माननीय उच्च न्यायालय के याचिका क्रमांक एवं म.प्र. शासन, उच्च शिक्षा विभाग, मंत्रालय, वल्लभ भवन, भोपाल के पत्र क्र.758/1021894/2022/38-2, भोपाल दिनांक 09/05/2023 के विषय मात्र में महाविद्यालयों की जनभागीदारी / स्वशासी /स्ववित्तीय निधि में नियुक्त संविदा कर्मचारियों को स्थायीकर्मी में विनियमित करने की योजना का उल्लेख कर दिया गया था। जबकि आपरेटिग पैरा है जनभागीदारी समिति का उल्लेख नही है।
उच्च शिक्षा विभाग, मंत्रालय, भोपाल के पत्र क्र. 1506/1880/2021/38-2, भोपाल, दिनांक 05/10/2023 के अनुसार “शासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत दैनिकवेतन भोगी श्रमिक को स्थायीकर्मी की श्रेणी प्रदाय किये जाने के संबंध में निर्देशित किया गया है। स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति ने आदेश जारी करते समय जानबूझकर म.प्र. शासन, सामान्य प्रशासन विभाग के पत्र क्र. एफ 5-1/2013/1/3 दिनांक 07/10/2016 में उल्लेखित प्रावधानों के विरुद्ध जनभागीदारी समिति से नियुक्त श्रमिक जोड़ दिया।
शासकीय और जनभागीदारी समिति मद से रखे गए श्रमिकों को स्थाई कर्मी बनाए जाने का आदेश दिया है से विपरीत स्थानीय प्रबंधन जनभागीदारी से अवैध और अनियमित तरीके से संविदा, फिक्स वेतन, को गलत तरीके से पहले स्थाई कर्मी घोषित कर दिया गया और बाद में आदेश निरस्त।
अलग-अलग खण्ड पीठ में मामले सुनवाई करते हुए डबल बेंच ने सरकार और स्थानीय प्रबंधन जनभागीदारी समिति को यह आदेश जारी किया है कि विधिवत तरीके से एक कारण बताओ नोटिस जारी करे उसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग के विरुद्ध नियुक्त किए गए है तो स्थाई कर्मी आदेश निरस्त कर देवे क्योंकि पूर्व में एक भी सूचना पत्र जारी नहीं किया गया था।
माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मनसुखलाल सराफ वि. अरुण कुमार तिवारी एवं अन्य (WP 198/1999) प्रकरण में पारित निर्णय दि. 06.08.2015 में स्पष्ट रूप से कहा था कि वे सारी नियुक्तियाँ अवैध हैं, जो तत्कालीन विभागीय भर्ती नियम में विहित प्रावधानों के अनुरूप नहीं की गई हैं। माननीय न्यायालय ने ऐसी सभी नियुक्तियों को निरस्त करने के निर्देश दिये थे जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी मुहर लगा दी है। मान. उच्च न्यायालय के निर्णय का संबंधित पैरा प्रस्तुत है-
The Chief Secretary of the State of Madhya Pradesh shall call upon the Secretary of the respective departments of the State, to enquire into whether any employee in his department has been or was appointed on regular basis without following the selection process prescribed in the relevant rules framed there for after coming into force of such rules; and to proceed against all such persons as also against the person(s) responsible for making such appointment, in accordance with law; and submit report in that behalf to the Chief Secretary of the State of Madhya Pradesh within four months from today. The Chief Secretary of the State of Madhya Pradesh must then initiate necessary proposal for issuance of a general Government order or on case to case basis, to formally revoke all such illegal appointments made in similar manner without following the selection procedure prescribed by the relevant recruitment rules. The services rendered by such persons consequential to revocation of appointment be treated as only contractual appointment during the relevant period and that no other benefit shall be given or will accrue to them as in the case of regular appointee appointed as per the prescribed selection process for recruitment.
माननीय न्यायालय का यह बड़ा फैसला मध्य प्रदेश शासन के विभिन्न विभागों में समय-समय पर की गईं अवैध नियुक्तियों को लेकर है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी SLPs 4674/6697 में पारित निर्णय दि. 23.02.2016/18.04.2017 के द्वारा मनसुखलाल सराफ़ वि. अरुण कुमार तिवारी एवं अन्य (WP 198/1999) प्रकरण के मामले में माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के डिवीजन बेंच द्वारा पारित निर्णय दि. 06.08.2015 को सही ठहराया है। WP 198/1999 में पारित निर्णय दि. 06.08.2015 के अनुसार मध्यप्रदेश शासन के विभिन्न विभागों में समय-समय पर की गई अवैध नियुक्तियाँ (जिनका तत्कालीन भर्ती नियम में प्रावधान नहीं था) निरस्त की जानी हैं एवं ऐसी नियुक्तियों की सूची माननीय न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने के निर्देश हैं।
जनभागीदारी समिति के बड़े पैमाने पर अवैध नियुक्तियाँ की गई। 1996-2026 तक फिक्स वेतन सविदा अकुशल कुशल उच्च कुशल अर्द्ध कुशल आउटसोर्स कर्मचारी के नाम पर की गई सभी नियुक्तियाँ मनसुखलाल सराफ़ वि. अरुण कुमार तिवारी एवं अन्य के मामले में पारित निर्णय के दायरे में आती हैं अतः ये सभी नियुक्तियाँ अवैध हैं।
स्थानीय प्रबंधन जनभागीदारी समिति में मूलतःरूप से अवैध नियुक्त का एक बहुत बड़ा फौज है। इनकी नियुक्ति महाविद्यालय स्तर पर बिना किसी चयन मापदंड के विशुद्ध रूप से सचिव एवं प्राचार्यों की कृपा से हुई थी। विचारणीय प्रश्न यह है कि महाविद्यालय स्तर पर बिना किसी विज्ञापन अथवा मेरिट/मापदंड के से नियुक्त किये गये ।
प्राचार्य और उच्च शिक्षा विभाग बार-बार गलत जानकारी प्रेषित कर इन अवैध नियुक्तियों को छिपाने का प्रयास कर रहा है। ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है क्योंकि इन अवैध नियुक्तियों में अधिकांश रसूखदार लोगों के परिचित व्यक्ति शामिल हैं। यह जानते हुए कि नियुक्तियाँ नियमानुकूल नहीं हैं, उच्च शिक्षा विभाग द्वारा माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में सही जानकारी प्रस्तुत नहीं की गई।
मनसुखलाल सराफ वि. अरुण कुमार तिवारी एवं अन्य तथा याचिका क्रमांक में पारित आदेश के मामले में शासकीय महाविद्यालयों में पंजीकृत स्थानीय प्रबंधन जनभागीदारी समिति से फिक्स वेतन, सविदा , अकुशल, कुशल, अर्द्ध कुशल,उच्च कुशल, आउटसोर्स भर्ती से अवैध नियुक्तियों को जारी स्थाई कर्मी आदेश निरस्त करने के लिए सूचना पत्र जारी करते हुए विविध नहीं होने पर स्थायी कर्मी आदेश और भर्ती तत्काल निरस्त किया जाना जाना है।
विभाग द्वारा 2016 से सभी रिक्त पदों को आउटसोर्स भर्ती नियम से भरने का आदेश दिया लेकिन उसके बाद भी जनभागीदारी समिति से अवैध तरीके से नियुक्तियां जारी रही ..?
जनभागीदारी समिति के स्वायत्त पंजीकृत समिति है । कोई आदेश नही लिया गया है। सरकार से कोई अनुदान राशि नहीं देता। श्रमिक पद पर रखे गए थे के लिए अलग अलग श्रमिकों को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा जिसमें स्पष्ट रूप से लिखना होगा कि आपकी नियुक्ति श्रमिक के रूप में कब हुई थी का साक्ष्य सहित सिद्ध करें। साथ ही जनभागीदारी समिति से श्रमिक के रूप में रखने के लिए हिंदी एवं अंग्रेजी समाचार पत्र में विज्ञापन , सूचना पत्र। दैनिक वेतनभोगी की श्रेणी में आते है सबूत । संविदा कर्मचारी को दैनिक वेतनभोगी माना गया है । स्ववित्तीय मद में प्रयोगशाला तकनीशियन की विभागीय अनुमति थी। श्रमिक के रूप में हुई चयन प्रक्रिया, नियुक्ति दिनांक को धारित योग्यता, साक्षात्कार, मेरिट लिस्ट। जनभागीदारी समिति ने सामान्य प्रशासन विभाग के सभी आदेश को आमेलन, मान्य करने का निर्णय। संविदा कर्मचारी भर्ती करने का प्रावधान , नियम गाइडलाइन। श्रमिकों का मानदेय के लिए छात्र छात्राओं का प्रति वर्ष शुल्क बढ़ाया जाएगा।
विभाग द्वारा 2016 में आउटसोर्स भर्ती के नियम और आदेश देने के बाद किस नियम से रखा गया की प्रति भी स्थाई कर्मी को उपलब्ध कराना होगा।
ऐसे सभी प्राचार्य सकते में आ गए हैं जिन्होंने स्थाई कर्मी आदेश जारी किए थे। निलंबन की तलवार लटक रही है..?






