मध्य प्रदेश

महाराणा प्रताप की 486 वी जन्म जयंती ग्राम जहानाबाद में मनाई गई

* महाराणा प्रताप की 486 मवी जन्म जयंती ग्राम जहानाबाद में मनाई गई उपरोक्त जानकारी देते हुए अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष ठाकुर संतोष सिंह दीक्षित ने बताया कि राजपूत समाज के पदाधिकारी श्री महेश सिंह चौहान प्रियंक सिंह ठाकुर के नेतृत्व में ग्राम जहानाबाद में महाराणा प्रताप जी की  जन्म जयंती का आयोजन किया गया था

जिसमें क्षेत्रीय विधायक श्री मंजू दादू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थी,

क्षेत्रीय विधायक श्री मंजू दादू मुख्य अतिथि

विशेष अतिथि जिला पंचायत सदस्य अनिल राठौड़ ठाकुर संतोष सिंह दीक्षित ,श्रीमती प्रीति सिंह राठौड़ जिला पंचायत सदस्य अनिल राठौड़ ठाकुर अरविंद सिंह युवा नेता विश्वास शिवहरे आलोक मिश्रा ने अजीत परदेसी सुमित वरुड मयूर तिवारी एवं अन्य समाज जनों ने उपस्थित होकर महाराणा प्रताप की जयंती में शामिल होकर महाराणा प्रताप की स्मृति में कहते हुए कहां की महाराणा प्रताप जैसा वीर प्रताप की संपूर्ण विश्व में कोई नहीं.

आज उनके समय में जो बाहरी विद्रोही जाकर भारत के खंड-खंड करना चाहते थे लेकिन महाराणा प्रताप की अधिक प्रतिज्ञा शूरवीरता दृढ़ता और पूरे संपूर्ण भारत को एक्shunya बनाए रखने के लिए उन्होंने सैकड़ो लड़ाई लड़ी उनका प्रताप यह था कि वह एक ही बार में हाथी सहित दुश्मन को काट देते थे ऐसे वीर प्रतापी के 486 सी जयंती पर संपूर्ण समाज जन उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्ति की उनके मार्ग पर चलने की कसम खाई संकल्प लिया उनके आदर्शों पर चलकर हम समाज को देश को मजबूत बनाएंगे. इस अवसर पर नेपानगर विधायक सुशी मनजीत दादू द्वारा महाराणा प्रताप की मूर्ति के लिए और कॉरिडोर के लिए एक करोड रुपए देने की घोषणा की सभी राजपूत समाज द्वारा उनका अभिनंदन किया गया उनका मान सम्मान किया गया शॉल श्रीफल द्वारा युवा नेता राजपूत समाज के महेश चौहान द्वारा उपरोक्त कार्यक्रम का आयोजन किया गया था उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप की गाथा – जंगल का राजा, मिट्टी का बेटा* ⚔️

*1. जन्म और प्रण* 
1540 में कुंभलगढ़ के किले में जन्म हुआ महाराणा उदय सिंह के बेटे प्रताप का। बचपन से ही जिद्दी और स्वाभिमानी। 13 साल की उम्र में ही कह दिया था – “मैं झुकूंगा नहीं, चाहे पहाड़ टूट जाए”। 
1572 में मेवाड़ की गद्दी मिली, पर अकबर का राजदूत आया – “मुगलों की अधीनता स्वीकार करो”। प्रताप ने जवाब दिया: “मेवाड़ की मिट्टी बिकाऊ नहीं है”।

*2. हल्दीघाटी का युद्ध – 18 जून 1576* 
अकबर ने मानसिंह को भेजा 80,000 की फौज के साथ। प्रताप के पास सिर्फ 3,000 भील और राजपूत। 
घमासान युद्ध हुआ। प्रताप का घोड़ा चेतक 80 किलो का आदमी + कवच लेकर 26 फीट की खाई फांद गया। जब चेतक घायल हुआ, तो प्रताप ने खुद उसकी पीठ पर पट्टी बांधी। चेतक ने आखिरी सांस तक साथ नहीं छोड़ा। आज भी हल्दीघाटी में चेतक की समाधि है।

युद्ध हारे, पर इज्जत नहीं हारी। अकबर जीता, पर प्रताप को झुका नहीं सका।

*3. जंगल का राजा* 
हार के बाद प्रताप ने महल छोड़ दिया। घास की रोटी खाई, पेड़ों के नीचे सोए। बेटी का जन्म हुआ तो दूध नहीं था, बिल्ली का दूध पिलाया। 
बीवी ने कहा “राज छोड़ दो”, तो प्रताप बोले: “राज जाएगा तो आएगा, पर स्वाभिमान गया तो कभी वापस नहीं आएगा”।

12 साल जंगल-जंगल भटके। भील आदिवासी उनके साथ खड़े रहे। महाराणा ने कहा “तुम मेरे भाई हो”, तभी से भील खुद को “मेवाड़ का बेटा” कहते हैं।

*4. दीवेर का युद्ध – वापसी* 
1582 में दीवेर में मुगलों को हराकर मेवाड़ का बड़ा हिस्सा वापस ले लिया। धीरे-धीरे चित्तौड़ छोड़कर बाकी पूरा मेवाड़ आजाद कर लिया। 
अकबर ने आखिर तक कहा “प्रताप को झुकाओ”, पर कोई झुका नहीं सका।

*5. सीख* 
महाराणा प्रताप ने सिखाया:
– ताकत से नहीं, जज्बे से लड़ते हैं
– हार जाना बुरा नहीं, बिक जाना बुरा है 
– राजा वो नहीं जिसके पास ताज हो, राजा वो है जिसके पास जमीर हो

*एक लाइन में गाथा*: 
“ताज छोड़कर तीर पकड़ लिया, महल छोड़कर जंगल चुन लिया, घुटने टेकने से बेहतर मौत चुन ली – यही थे महाराणा प्रताप”।

“राणा प्रताप अमर रहें” 🚩

आपको गाथा का कौन सा किस्सा सबसे ज्यादा पसंद आया – चेतक वाला, घास की रोटी वाला, या दीवेर वाला?

Vijay Vishwakarma

Vijay Vishwakarma is a respected journalist based in Bhopal, who reports for Goodluck Media News. He is known for his exceptional reporting skills and extensive knowledge of the region. With a keen eye for detail and a passion for uncovering the truth, he has earned a reputation as a reliable and trustworthy source of news.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button