राष्ट्रीय आंदोलन में भारत की जनजातियां भी पीछे नहीं रहीं,निखिलेश महेश्वरी की पुस्तक जनजाति गौरव बिरसा मुंडा का विमोचन

भोपाल। भगवान बिरसा मुंडा के सार्धशती समारोह के अवसर पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित शोधपरक और प्रेरक पुस्तक “जनजाति गौरव बिरसा मुंडा” का विमोचन गुरुवार को गरिमामयी वातावरण में सम्पन्न हुआ। विद्या भारती मध्यभारत प्रांत के प्रांत संगठन मंत्री श्री निखिलेश महेश्वरी द्वारा लिखी गई इस पुस्तक का प्रकाशन मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल द्वारा किया गया है। यह निखिलेश जी की छठी पुस्तक है, जिसे उन्होंने मात्र डेढ़ महीने में लिखा है।
सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान प्रज्ञादीप में आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक श्री अशोक पांडे रहे जबकि अध्यक्षता श्री विश्वास कैलाश सारंग, मंत्री, खेल एवं युवा कल्याण तथा सहकारिता विभाग, मध्यप्रदेश शासन ने की। विशिष्ट अतिथियों में निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अध्यक्ष डॉ. खेमसिंह डेहरिया, हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक श्री अशोक कड़ेल, एवं पुस्तक के लेखक श्री निखिलेश महेश्वरी उपस्थित रहे।
लेखक श्री निखिलेश महेश्वरी ने पुस्तक की भूमिका रखी। उन्होंने पुस्तक में शामिल बिरसा मुंडा के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथि डॉ खेमसिंह डेहरिया एवं श्री अशोक कड़ेल ने पुस्तक को आज की युवा पीढ़ी को पठनीय एवं आवश्यक बताया।
विमोचन अवसर पर मुख्य अतिथि श्री अशोक पांडे ने कहा कि बिरसा मुंडा का जन्म 1875 में हुआ, जब अंग्रेजों ने इस देश के स्वाभिमान को कुचलने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारत में विद्रोह उठे, लेकिन इस देश की आत्मा को दबाया नहीं जा सका। इसी काल में समाज में चेतना का पुनर्जागरण हुआ।
उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा ने देश के पराक्रम और संस्कृति के पुनर्जागरण में ऐतिहासिक योगदान दिया। उन्होंने जनजातीय समाज को अपनी मूल पहचान और संस्कृति से जोड़ा। यज्ञोपवीत धारण, तिलक, जगन्नाथ मंदिर दर्शन जैसी परंपराओं को अपनाने और समाज को भारतीयता की ओर लौटाने का संदेश दिया। बिरसा मुंडा के विचार एकता, अखंडता और स्वाभिमान का प्रतीक हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में मंत्री श्री विश्वास सारंग ने कहा कि निखिलेश महेश्वरी ने अपनी पुस्तक में बिरसा मुंडा के जीवन चक्र, अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष, धर्म परिवर्तन के विरोध, समाज सुधार और शिक्षा जागरण के सभी पहलुओं को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया है।
उन्होंने कहा — “मात्र 25 वर्ष की आयु में जनजाति समाज के एक पुत्र ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए। यह पुस्तक समाज को जोड़ने और युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत करने वाली कृति है।” पूर्ववर्ती सरकारों ने बिरसा मुंडा जैसे जननायकों को इतिहास से मिटाने का प्रयास किया, किंतु अब ऐसे महान विभूतियों के योगदान को जन-जन तक पहुँचाना आवश्यक है।
वक्ताओं ने कहा कि बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के विरुद्ध महाविद्रोह किया। “जल, जंगल और जमीन” के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और समाज में समानता, शिक्षा, आत्मसम्मान की भावना जगाई। उन्होंने वेदों और रामायण का अध्ययन कर जनजातीय समाज को अपनी मूल संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया। ब्रिटिश शासन के दमन के बीच भी उन्होंने अंतिम समय तक संघर्ष किया और 9 जून 1900 की प्रातः रांची जेल में अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी स्मृति में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है। सभी अतिथियों ने इस पुस्तक को युवा वर्ग में राष्ट्रीय चेतना और जनजागरण फैलाने वाला ग्रंथ बताया।
कार्यक्रम का संचालन श्री शिरोमणि दुबे ने किया। समारोह में प्रांत अध्यक्ष श्री मोहन गुप्त, जिला प्रभारी श्री दिग्विजय सिंह द्वारा अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। इस अवसर पर अनेक गणमान्य नागरिक, शिक्षाविद्, शिक्षक और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।



